पारिवारिक कानून और साक्ष्य अधिनियम के जटिल मामलों में, बच्चे की वैधता और जीवनसाथी की बेवफाई के बीच का टकराव अक्सर एक बड़ा विवाद का विषय रहा है। एक तरफ व्यक्ति का निजता का अधिकार है, तो दूसरी तरफ न्यायालय के लिए सच सामने लाने की आवश्यकता। हाल ही में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने कमला पटेल बनाम गोविंद बहादुर (Misc. Petition No. 5428 of 2023) मामले में एक बेहद अहम फैसला सुनाया है । यह निर्णय स्पष्ट करता है कि व्यभिचार (Adultery) के आधार पर दायर तलाक की याचिका में पारिवारिक अदालत (Family Court) किन परिस्थितियों में डीएनए (DNA) टेस्ट का आदेश दे सकती है ।
आइए इस महत्वपूर्ण फैसले के प्रमुख बिंदुओं और कानूनी सिद्धांतों को विस्तार से समझते हैं।
पृष्ठभूमि: ‘गैर-पहुंच’ (Non-Access) और बेवफाई का दावा
इस मामले की शुरुआत एक भारतीय सेना के जवान (पति) द्वारा व्यभिचार के आधार पर तलाक की याचिका दायर करने से हुई । पति ने पारिवारिक अदालत में उस बच्ची के डीएनए टेस्ट की मांग की, जिसका जन्म विवाह के दौरान हुआ था ।
पति का मुख्य तर्क भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत “गैर-पहुंच” (Non-access) पर आधारित था । उसने अदालत में स्पष्ट रूप से बताया कि अक्टूबर 2015 में उसकी पत्नी (जो मध्य प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल है) ने उसे ड्यूटी से वापस बुलाया था । घर लौटने के मात्र चार दिन बाद ही पत्नी ने उसे बताया कि वह गर्भवती है । इसके आठ महीने के भीतर ही बच्ची का जन्म हो गया । पति ने तर्क दिया कि चिकित्सकीय रूप से यह कतई संभव नहीं है कि गर्भधारण के मात्र चार दिन के भीतर ही किसी महिला को अपनी गर्भावस्था का पता चल जाए । इस आधार पर पति ने दावा किया कि जब बच्चा वास्तव में गर्भ में आया, तब उसकी अपनी पत्नी तक कोई पहुंच नहीं थी और पत्नी ने उसे गुमराह किया है ।
पत्नी ने फैमिली कोर्ट के डीएनए टेस्ट के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उसका तर्क था कि यह परीक्षण उसकी निजता के अधिकार का हनन करता है और साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत बच्चे की वैधता (Legitimacy) पर अनावश्यक सवाल उठाता है, जो बच्चे के सर्वोत्तम हित में नहीं है ।
साक्ष्य अधिनियम की धारा 112: वैधता बनाम व्यभिचार
इस मामले में मुख्य कानूनी बहस भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 112 के इर्द-गिर्द घूमती रही। यह धारा एक वैध विवाह के दौरान पैदा हुए बच्चे की वैधता का “निर्णायक प्रमाण” (Conclusive proof) प्रदान करती है । पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट के अपर्णा अजिंक्य फिरोदिया बनाम अजिंक्य अरुण फिरोदिया (2024 (7) SCC 773) मामले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 112 की इस धारणा को आसानी से तोड़ा नहीं जा सकता और केवल एक पक्ष के कहने पर डीएनए टेस्ट का आदेश नहीं दिया जा सकता ।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य ऐतिहासिक फैसले, दीपन्विता रॉय बनाम रानोब्रतो रॉय ((2015) 1 SCC 365) पर भरोसा जताया । अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तलाक की याचिका विशेष रूप से व्यभिचार के आधार पर दायर की जाती है, तो अदालत का मुख्य उद्देश्य पत्नी या पति की बेवफाई को साबित करना या खारिज करना होता है । ऐसे मामलों में बच्चे की वैधता का प्रश्न केवल प्रासंगिक (Incidentally involved) होता है । इसलिए, सत्य तक पहुंचने और बेवफाई के दावे को प्रमाणित करने के लिए डीएनए परीक्षण सबसे सटीक, प्रामाणिक और वैज्ञानिक तरीका है ।
अदालत ने आर. राजेंद्रन बनाम कमर निशा (2025 SCC OnLine SC 2372) का भी संदर्भ दिया, जो यह स्पष्ट करता है कि डीएनए परीक्षण का आदेश बेवफाई साबित करने के लिए दिया जा सकता है, न कि केवल बच्चे को अवैध घोषित करके किसी पर आपराधिक आरोप मढ़ने के लिए ।
“अत्यंत आवश्यकता” (Eminent Need) और हितों का संतुलन
उच्च न्यायालय ने इवान रतिनम बनाम मिलान जोसेफ (2025 SCC OnLine SC 175) मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का भी संदर्भ लिया । इस फैसले में डीएनए टेस्ट का आदेश देने से पहले “अत्यंत आवश्यकता” (Eminent Need) और “हितों के संतुलन” (Balancing the interests) पर बहुत जोर दिया गया है ।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, डीएनए टेस्ट का आदेश देने से पहले दो बाधाओं को पार करना होता है: पहला, अदालत को यह देखना चाहिए कि क्या मौजूदा सबूत अपर्याप्त हैं; और दूसरा, क्या डीएनए टेस्ट का आदेश देना शामिल पक्षों के सर्वोत्तम हित में है ।
उच्च न्यायालय ने पाया कि कमला पटेल बनाम गोविंद बहादुर मामले में पति ने गैर-पहुंच के बारे में बेहद विशिष्ट और वैज्ञानिक रूप से तार्किक तथ्य प्रस्तुत किए थे (चार दिनों के भीतर गर्भावस्था का पता चलने की असंभवता) । चूंकि बेवफाई के दावे को साबित करने के लिए इस चिकित्सा तथ्य को सुलझाना नितांत आवश्यक था, इसलिए अदालत ने डीएनए टेस्ट के आदेश को पूरी तरह से उचित माना ।
निजता का अधिकार और प्रतिकूल अनुमान (Adverse Presumption)
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण और व्यावहारिक पहलू पत्नी के निजता के अधिकार से संबंधित है। भारतीय कानून के तहत, अदालत किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध डीएनए नमूने देने के लिए शारीरिक रूप से मजबूर नहीं कर सकती ।
इसे ध्यान में रखते हुए, उच्च न्यायालय ने आदेश को बरकरार रखा लेकिन एक सख्त कानूनी चेतावनी (Caveat) भी दर्ज की। अदालत ने निर्देश दिया कि पत्नी के पास आदेश का पालन करने या उसे अस्वीकार करने की स्वतंत्रता है । लेकिन, यदि पत्नी डीएनए नमूने देने से इनकार करती है, तो पारिवारिक अदालत भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 (दृष्टांत h) या नए भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) 2023 के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत उसके खिलाफ “प्रतिकूल अनुमान” (Adverse Presumption) निकालने के लिए स्वतंत्र होगी ।
इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि पत्नी टेस्ट से इनकार करती है, तो कानूनन अदालत यह मान सकती है कि डीएनए परीक्षण के परिणाम पत्नी के खिलाफ होते। इस प्रकार, टेस्ट से इनकार करने को पति के व्यभिचार के आरोपों की पुष्टि के रूप में देखा जा सकता है ।
निष्कर्ष
कमला पटेल बनाम गोविंद बहादुर का निर्णय पारिवारिक न्यायालयों के लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करता है। यह स्थापित करता है कि यद्यपि साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 बच्चे की वैधता की रक्षा करती है, लेकिन जब “गैर-पहुंच” (Non-access) के विशिष्ट और विश्वसनीय दावे किए जाते हैं, तो इसे बेवफाई साबित करने से रोकने के लिए एक ढाल के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिक सत्य की खोज और व्यक्ति की निजता के अधिकार के बीच प्रतिकूल अनुमान (Adverse Presumption) के माध्यम से एक शानदार कानूनी संतुलन स्थापित किया गया है।
व्यभिचार और डीएनए टेस्ट से जुड़े
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रमुख निष्कर्ष (Key Takeaways)
(For Litigants)
जीवनसाथी पर बेवफाई के केवल अस्पष्ट आरोप लगाना डीएनए टेस्ट का आदेश प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है। आपको “गैर-पहुंच” साबित करने वाले विशिष्ट और तथ्यात्मक आधार, जैसे सेना की ड्यूटी पर बाहर होना और गर्भावस्था का चिकित्सकीय समय-चक्र, मजबूती से पेश करने होंगे।
यद्यपि आप अपनी निजता की रक्षा के लिए डीएनए टेस्ट से इनकार करने का अधिकार रखते हैं, लेकिन यह कोई कानूनी बचाव का रास्ता नहीं है। अदालत इस इनकार का इस्तेमाल आपके खिलाफ यह मानकर कर सकती है कि आप पर लगे व्यभिचार के आरोप सच हैं।
(For Legal Practitioners)
व्यभिचार और पितृत्व से जुड़े पारिवारिक विवादों में याचिका तैयार करते समय “पहुंच” और “गैर-पहुंच” की समय-सीमा का अत्यंत बारीकी से विवरण दें। अदालतों को केवल वैवाहिक संबंधों की “असमर्थता” नहीं, बल्कि “असंभवता” सिद्ध करनी होती है।
बच्चे को अवैध घोषित करने वाले मामलों और व्यभिचार के कारण तलाक के मामलों में अंतर करें। धारा 112 को पूर्ण बाधा मानने के तर्कों को काटने के लिए सुप्रीम कोर्ट के दीपन्विता रॉय बनाम रानोब्रतो रॉय फैसले का मजबूत संदर्भ लें।
(For Judiciary / Family Courts)
पारिवारिक अदालतों को आसानी से डीएनए टेस्ट का आदेश नहीं देना चाहिए। आदेश देने से पहले यह सुनिश्चित करें कि मौजूदा सबूत अपर्याप्त हैं और डीएनए टेस्ट का आदेश सभी पक्षों के हितों का संतुलन बनाए रखता है।
अदालतों को अपने आदेश में स्पष्ट रूप से यह दर्ज करना चाहिए कि पक्षकार परीक्षण से इनकार कर सकता है, लेकिन साथ ही धारा 114(h) के तहत प्रतिकूल अनुमान निकाले जाने की चेतावनी भी शामिल करनी चाहिए। इससे सत्य की खोज और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बना रहता है।
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